​कुछ ख़्वाब पुरानी दराज़ों में सँभाले रखे हैं,

हमने चिराग़ कई आंधियों के हवाले रखे हैं।

​लोग कहते हैं कि लफ़्ज़ों में बयाँ कर दो सब,

हमने तो ख़ामोशियों में भी कई ज़माने रखे हैं।

​एक मुद्दत हुई खुद से मुलाक़ात किए हुए,

आईने के रूबरू बस चंद अफ़साने रखे हैं।

​ये जो बहती है हवाओं में उदासी की महक,

शायद किसी ने बिछड़ते हुए वादे सँभाले रखे हैं।

​हम तो महफ़िल में भी तन्हा ही गुज़र जाते हैं,

दिल के गोशे में मगर तेरे ही ठिकाने रखे हैं।

​राह तकते हुए थकती नहीं ये आँखें कभी,

उम्मीद के शहर में हमने कई आशियाने रखे हैं।

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